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बुधवार, 9 नवंबर 2016

तुलसी असाध्य रोगों को भी जड़ से खत्म करने में सक्षम और तुलसी के महत्वपूर्ण औषधीय उपयोगी गुण

तुलसी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी पौधा है। इसके सभी भाग अलौकिक शक्ति और तत्वों से परिपूर्ण माने गए हैं। तुलसी के पौधे से निकलने वाली सुगंध वातावरण को शुध्द रखने में तो अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही है, भारत में आयुर्वेद चिकित्सा पध्दति में भी तुलसी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। तुलसी का सदियों में औषधीय रूप में प्रयोग होता चला आ रहा है।

तुलसी दल का प्रयोग खांसी, विष, श्वांस, कफ, बात, हिचकी और भोज्य पदार्थों की दुर्गन्ध को दूर करता है। इसके अलावा तुलसी बलवर्ध्दक होती है तथा सिरदर्द स्मरण शक्ति, आंखों में जलन, मुंह में छाले, दमा, ज्वर, पेशाब में जलन व विभिन्न प्रकार के रक्त व हृदय संबंधी बीमारियों को दूर करने में भी सहायक है। तुलसी में छोटे-छोटे रोगों से लेकर असाध्य रोगों को भी जड़ में खत्म कर देने की अद्भुत क्षमता है। इसके गुणों को जानकर और तुलसी का उचित उपयोग कर हमें अत्यधिक लाभ मिल सकता है।

तुलसी के महत्वपूर्ण औषधीय उपयोगी एवं गुणों पर एक नजर :-

* श्वेत तुलसी बच्चों के कफ विकार, सर्दी, खांसी इत्यादि में लाभदायक है।

* कफ निवारणार्थ तुलसी को काली मिर्च पाउडर के साथ लेने से बहुत लाभ होता है।

* गले में सूजन तथा गले की खराश दूर करने के लिए तुलसी के बीज का सेवन शक्कर के साथ करने से बहुत राहत मिलती।

* तुलसी के पत्तों को काली मिर्च, सौंठ तथा चीनी के साथ पानी में उबालकर पीने में खांसी, जुकाम, फ्लू और बुखार में फायदा पहुंचता    है।

* पेट में दर्द होने पर तुलसी रस और अदरक का रस समान मात्रा में लेने से दर्द में राहत मिलती है। इसके उपयोग से पाचन क्रिया में भी सुधार होता है।

* कान के साधारण दर्द में तुलसी की पत्तियों का रस गुनगुना करके डाले।

* नित्य प्रति तुलसी की पत्तियां चबाकर खाने से रक्त साफ होता है।

* चर्म रोग होने पर तुलसी के पत्तों के रस के नींबू के रस में मिलाकर लगाने से फायदा होता है।

* तुलसी के पत्तों का रस पीने से शरीर में ताकत और स्मरण शक्ति में वृध्दि होती है।

* प्रसव के समय स्त्रियों को तुलसी के पत्तों का रस देन से प्रसव पीड़ा कम होती है।

* तुलसी की जड़ का चूर्ण पान में रखकर खिलाने से स्त्रियों का अनावश्यक रक्तस्राव बंद होता है।

* जहरीले कीड़े या सांप के काटने पर तुलसी की जड़ पीसकर काटे गए स्थान पर लगाने से दर्द में राहत मिलती है।

* फोड़े फुंसी आदि पर तुलसी के पत्तो का लेप लाभदायक होता है।

* तुलसी की मंजरी और अजवायन देने से चेचक का प्रभाव कम होता है। 

* सफेद दाग, झाईयां, कील, मुंहासे आदि हो जाने पर तुलसी के रस में समान भाग नींबू का रस मिलाकर 24 घंट तक धूप में रखे। थोड़ा गाढ़ा होने पर चेहरे पर लगाएं। इसके नियमित प्रयोग से झाईयां, काले दाग, कीले आदि नष्ट होकर चेहरा बेदाग हो जाता है।

* तुलसी के बीजों का सेवन दूध के साथ करने से पुरुषों में बल, वीर्य और संतोनोत्पति की क्षमता में वृध्दि होती है।

* तुलसी का प्रयोग मलेरिया बुखार के प्रकोप को भी कम करता है।

* तुलसी का शर्बत, अबलेह इत्यादि बनाकर पीने से मन शांत रहता है।

* आलस्य निराशा, कफ, सिरदर्द, जुकाम, खांसी, शरीर की ऐठन, अकड़न इत्यादि बीमारियों को दूर करने के लिए तुलसी की जाय का सेवन करें।

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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

तुलसी के पौधे से दूर करे वास्तु दोष - TULSI KE PAUDHE SE DUR KARE VASHTU DOSH





वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक के खाली स्थान में लगा सकते है यदि खाली जमीन ना हो तो गमलों में भी तुलसी को स्थान दे कर सम्मानित किया जा सकता है. 

तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है. 

कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है सारी बाधाए दूर होती है. 

यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

नौकरी में यदि उच्चाधिकारी की वजह से परेशानी हो तो ऑफिस में खाली जमीन या किसी गमले आदि जहाँ पर भी मिटटी हो वहां पर सोमवार को तुलसी के सोलह बीज किसी सफेद कपडे में बाँध कर सुबह दबा दे सम्मन की वृद्धि होगी. नित्य पंचामृत बना कर यदि घर कि महिला शालिग्राम जी का अभिषेक करती है तो घर में वास्तु दोष हो ही नहीं सकता । 


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तुलसी का पौधा बता देगा, आप पर कोई मुसीबत आने वाली है,इस पोस्ट को एक बार ज़रूर पढ़ें और शेयर करना ना भूले





तुलसी का पौधा बता देगा, आप पर कोई मुसीबत आने वाली है।सभी मित्रों के लिए महत्वपूर्ण है । 

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। 

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है वहां लक्ष्मी जी का निवास नही होता।

 अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं।प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है मां तुलसी के समीप आसन लगा कर यदि कुछ समय हेतु प्रतिदिन बैठा जाये तो श्वास के रोग अस्थमा आदि से जल्दी छुटकारा मिलता है.

घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है हमारें शास्त्र इस के गुणों से भरे पड़े है जन्म से लेकर मृत्यु तक काम आती है यह कभी सोचा है कि मामूली सी दिखने वाली यह तुलसी हमारे घर या भवन के समस्त दोष को दूर कर हमारे जीवन को निरोग एवम सुखमय बनाने में सक्षम है माता के समान प्रदान करने वाली तुलसी का वास्तु शास्त्र में विशेष स्थान है हम ऐसे समाज में निवास करते है कि सस्ती वस्तुएं एवम सुलभ सामग्री को शान के विपरीत समझने लगे है महंगी चीजों को हम अपनी प्रतिष्ठा मानते है कुछ भी हो तुलसी का स्थान हमारे शास्त्रों में पूज्यनीय देवी के रूप में है तुलसी को मां शब्द से अलंकृत कर हम नित्य इसुख सकी पूजा आराधना भी करते है इसके गुणों को आधुनिक रसायन शास्त्र भी मानता है इसकी हवा तथा स्पर्श एवम इसका भोग दीर्घ आयु तथा स्वास्थ्य विशेष रूप से वातावरण को शुद्ध करने में सक्षम होता है शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते है उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है सबके गुण अलग अलग है शरीर में नाक कान वायु कफ ज्वर खांसी और दिल की बिमारिओं पर खास प्रभाव डालती है.

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रविवार, 6 नवंबर 2016

ट्रेक्किग इन उत्तराखंड - TREKKING TO SOURCE OF THE GANGA

SOURCE OF THE GANGA

भारत में गंगा में एक पौराणिक कथा है, एक कहानी और अपने पाठ्यक्रम के हर दूसरे कदम पर एक धारणा यह से जुड़ी है और गंगोत्री ग्लेशियर पर अपने स्रोत है अलग नहीं है। गौमुख (गाय के मुंह) जहां गंगा निकलती से भी एक तीर्थ मूल्य और एक किंवदंती से जुड़ी है। यह कहा जाता है कि राजा भगीरथ गंगा स्वर्ग से यहां नीचे मिला है, ताकि मोक्ष अपने बेटों के लिए खरीदा जा सकता है। इसकी हिमलंब गंगोत्री ग्लेशियर के साथ यह सच है या नहीं गौमुख हर पैदल चलने और साहसी, जो पसंद के सबसे जहां एक भी भागीरथी चोटियों की एक शानदार दृश्य देखने के लिए हो जाता है से शिवलिंग चोटी के आधार पर शिविर सही करने के लिए गौमुख बिंदु से आगे जाने के लिए एक चुनौती है ।



दिनों की संख्या: 08-09 दिन
Catagotry: मध्यम साहसिक
क्षेत्र उत्तराखंड, भारत
  • तपोवन आधार शिविर
  • भागीरथी और शिवलिंग पहाड़ 6500m
  • गंगोत्री Shrine- प्रसिद्ध तीर्थ 4 में से एक
  • साधु / संतों की जीवन शैली के साथ इंटरेक्शन
  • गंगा गोमुख के स्रोत के एक महान विचारों
  • सबसे अच्छा समय जाने के लिए : मई जून अंत तक, सितम्बर नवम्बर तक
  • उच्चतम बिंदु 4500m
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ट्रेक्किग-TREKKING - यमुनोत्री से डोडिताल ट्रेक - TREKKING IN UTTRAKHAND

उत्तराखंड जो पूर्व में उत्तरांचल के रूप में जाना जाता था भारत के उत्तरी भाग में एक राज्य है। राज्य पर्वत श्रृंखला और शानदार घाटियों से भरा है। दर्शक को ट्रेकर्स(trekkers) के लिए करने के लिए स्थानों में से कुछ किन्नौर को Pubin दर्रा(Pubin pass), दोदो ताल यमुनोत्री के लिए(Dodo Tal to Yamunotri), गंगा के स्रोत(Source of Ganges), हेम कुंड(Hem Kund), फूलों की घाटी(Valley of the flowers), Kuari दर्रा(Kuari Pass) और पिंडारी ग्लेशियर(Pindari Glacie) आदि कर रहे हैं.



YAMUNOTRI TO DODITAL TREK

डोडिताल (Dodital) उत्तराखंड, भारत में ताजे पानी की झील, 3,024 मीटर (9,921 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है। लोकप्रिय कथाओं में से एक के अनुसार भगवान गणेश ने अपने निवास के रूप में इस जगह को चुना। वहाँ भी एक मंदिर यहां भगवान गणेश को समर्पित है। इस झील के लिए एक और नाम है, जिसका अर्थ Ganesh Ka ताल या गणेश की झील 'dhundital' है। मानव चट्टी से Dodital ट्रेक जो Yamnotri घाटी में है। यमुनोत्री में यमुना नदी के स्रोत और हिंदू धर्म में देवी यमुना जी बिराजमान  है। यह गढ़वाल हिमालय में 3,293 मीटर (10,804 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है और लगभग 30 किलोमीटर (19 मील) उत्तरकाशी के उत्तर में स्थित है। यह भारत के चार धाम तीर्थयात्रा में चार साइटों में से एक है।



दिनों की संख्या: 06 दिन 
श्रेणी: मध्यम साहसिक 
क्षेत्र : उत्तराखंड, भारत 

           * यमुनोत्री श्राइन (Yamnotri shrine) 
           * द्वारा टॉप ( Drawa Top)
           * डोडिताल झील (Dodital Lake)
           * उच्चतम बिंदु 4000m 
           * सबसे अच्छा समय जाने के लिए: मई जून अंत तक, सितम्बर मध्य नवम्बर तक
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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

गंगोत्री का पौराणिक महत्त्व-GANGOTRI YATRA KA MAHATVA AUR KATHA

गंगोत्री
गंगोत्री पौराणिक काल से ही धार्मिक स्थल के रूप मे प्रसिद्ध रही है. प्राचीन समय से ही अनेक ऋषी-मुनि और साधु लोग इस दुर्गम क्षेत्र के पावन धाम से आकर्षित रहें हैं.गंगोत्री गंगा नदी का उद्गगम स्थल माना जाता है इस पावन धाम के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते हें और दीपावली के दिन मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं.
 गंगोत्री एक धार्मिक स्थल है यहां पहुँचने वाले तीर्थयात्री विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर्म कांड संपूर्ण करते हैं यहां मौजूद पंडित एवं पुरोहित तीर्थयात्रियों एवं भक्तजनों के विभिन्न धार्मिक कार्य और कर्मकांडों में सहायता करते हैं. यह तीर्थयात्रियों के परिवारों का इतिहास रखने के अलावा वंश के इतिहास को स्मृ्तियों में रखने की एक प्राचीन रीति भी पूर्ण करते हैं.


गंगोत्री पौराणिक कथा :

गंगोत्री हिंदुओं के पावन चार धामों मे से एक है इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व सभी को आलौकिक करता है धार्मिक संदर्भ के अनुसार राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया यज्ञ का घोडा़ इंद्र ने चुरा लिया राजा सगर के सारे पुत्र घोड़े की खोज में निकल पडे. घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था.

सगर के पुत्रों ने सोचा की ऋषि ने ही घोड़े को पकडा है इस पर उन्होंने ऋषि का अपमान किया.ऋषि ने अपनी आँखें खोली और क्रोध से सगर के साठ हज़ार पुत्रों को जलाकर भस्म कर दिया और वह मृत आत्माएँ भूत बनकर भटकने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया था.
भगीरथ जो राजा दिलीप के पुत्र थे. उन्होने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने का निश्चय किया तथा गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार की रीतिपूर्ण कर राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके. और भटकती आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हो.

भगीरथ ने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके. ब्रह्मा कठोर तपस्या देखकर प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने को कहा ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो. उस समय गंगा ने कहा कि इतनी ऊँचाई से पृथ्वी पर गिरने से पृ्थ्वी मेरा इतना वेग नहीं सह पाएगी.
तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और भगवान शिव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर एक लट खोल दी जिससे गंगा की पृथ्वी पर अविरल रुप से प्रवाहित हुई और सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ गंगोत्री वह स्थान है जो गंगा का उद्गम स्थल बना.

गंगोत्री प्रमुख धर्म स्थल:
मुखीमठ मंदिर :

मुखबा के लोग भी गंगोत्री मंदिर के पुजारी हैं जहां मुखीमठ नामक मंदिर भी है. हर साल दीपावली के समय गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद होने पर देवी गंगा को बडी़ धूम धाम के साथ मुखबा गांव में लाया जाता है. और तब तक यहां पर आने वाले छ: महीनों और बसंत आने तक गंगा मां की नियमित रूप से पूजा अर्चना की जाती है

गौमुख :

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर और ऊंचाई पर स्थित एक प्रमुख स्थल है गौमुख यह गंगोत्री की शुरुवात तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल भी है. यहां पर अनेक भक्तजन आकर इसके ठंडे बर्फिले जल में स्नान करके आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं. आस्था है की यहां पर स्नान करके पापों से मुक्ति ओर मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस गौमुख ग्लेशियर में भगीरथी एक छोटी गुफानुमा द्वार से प्रवाहित होती है गंगोत्री से गौमुख की दूरी पैदल या फिर वहां उपलब्ध सवारी से तय की जाती है.

भैरों घाटी :

गंगोत्री से 9 किलोमीटर की दूरी तय करके भैरों घाटी तक पहुँचा जाता है. यह घाटी जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है. गंगोत्री मंदिर पर पहुंचने से पहले इस भैरव मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिये. इस स्थल पर भागीरथी का बहाव भी तेज होता है यह स्थल हिमालय का एक मनोरम दर्शन स्थल है जहां से भृगु पर्वत श्रृंखला तथा चीड़वासा की चोटियों के दर्शन संभव हैं.

गंगोत्री प्रसिद्ध कुंड :

गंगोत्री में अनेक तालाब एवं कुंड हैं. जिनमें से प्रमुख नाम ब्रह्मकुंडविष्णु कुंड है. इन जल कुंड में लोग स्नान  करके अपने को पवित्र करते हैं तथा इनमें  डुबकी लगानने से ही संपूर्ण कर्मकांडो पूर्ण होते हैं यह एक महत्वपूर्ण कार्य है स्नान के उपरांत किया गया दान पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है.  मान्यता है कि पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये परिजनो की आत्मा कि शांति के इसी स्थान पर आकर यज्ञ का अनुष्ठान किया था. गंगोत्री का पवित्र एवं भव्य मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार ऊंचे पत्थरों से निर्मित है.
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बद्रीनाथजी की कथा और महत्व - BADRINATHJI KATHA AUR MAHATVA

बद्रीनाथ




नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ भारत के उत्तराखंड में हिमालय पहार पर मंदाकिनी नदी के पास केदारनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए. बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है. केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी हुआ. यह तीर्थ शिव का अत्यंत प्रिय स्थान है. जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है.

 भारत के प्रसिद्ध चार धामों में द्वारिकाजगन्नाथपुरीरामेश्वर व बदरीनाथ आते है. इन चार धामों का वर्णन वेदों व पुराणौं तक में मिलता है. चार धामों के दर्शन का सौभाग्य पूर्व जन्म पुन्यों से ही प्राप्त होता है. इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ धाम है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है.

बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल हैजहां नर और नारायण दोनों मिलते है. धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इसे विशालपुरी भी कहा जाता है. और बद्रीनाथ धाम में श्री विष्णु की पूजा होती है. इसीलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है. यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है. मंदिर के मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है. बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है. यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है.

बद्रीनाथ धाम से संबन्धित मान्यता के अनुसार इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यहीं कारण हैकि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. इस धाम में स्थापित श्री विष्णु की मूर्ति में मस्तक पर हीरा लगा है. मूर्ति को सोने से जडे मुकुट से सजाया गया है. यहां की मुख्य मूर्ति के पास अन्य अनेक मूर्तियां है. जिनमें नारायणउद्ववजीकुबेर व नारदजी कि मूर्ति प्रमुख है. मंदिर के निकट ही एक कुंड हैजिसका जल सदैव गरम रहता है.

बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम हैइसीलिए इसे वैकुण्ठ की तरह माना जाता है. यह माना जाता हैकि महर्षि वेदव्याज जी ने यहीं पर महाभारत और श्रीमदभागवत महान ग्रन्थों की रचना हुई है. यहां भगवान श्री कृ्ष्ण को केशव के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इस स्थान पर क्योकि देव ऋषि नारद ने भी तपस्या की थी. देव ऋषि नारद के द्वारा तपस्या करने के कारण यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है.

यहां आकर तपस्या करने वालों में उद्वव भी शामिल है. इन सभी की मूर्तियां यहां मंदिर में रखी गई है. मंदिर के निकट ही अन्य अनेक धार्मिक स्थल है. जिसमें नारद कुण्डपंचशिलावसुधाराब्रह्माकपालसोमतीर्थमाता मूर्ति,शेष नेत्रचरण पादुकाअलकापुरीपंचतीर्थ व गंगा संगम.


बद्रीनाथ धाम पौराणिक कथा :

भगवान श्री विष्णु का विश्राम स्थल क्षीरसागर है. यहां ये शेषनाग पर लेटे रहते है. तथा देवी लक्ष्मी भगवान श्री विष्णु के पैर दबाती है. देवी से सदैव अपनी सेवा कराने की बात ऋषि नारद ने श्री विष्णु से बोल दी. ऋषि नारद की बाद से भगवान विष्णु को दु:ख पहुंचा. और वे क्षीरसागर को छोड कर हिमालय के वनों में चले गयें. वहां वे बैर खाकर तपस्या करते रहे हे.

देवी लक्ष्मी को उन्होने पहले ही नागकन्याओं के पास भेज दिया था. नागकन्याओं के पास से जब देवी लक्ष्मी लौटी तोवे वहां भगवान श्री विष्णु को न पाकर परेशान हो गई़. कई जगहों पर श्री विष्णु को ढूंढने पर वे हिमालय में ढूंढने पहुंच गई. वहां देवी को भगवान श्री विष्णु बेर के वनों में तपस्या करने नजर आयें. इस पर देवी ने भगवान श्री विष्णु को बेर के  स्वामी के नाम से संम्बोधित किया. तभी से इस धाम का नाम बद्रीनाथ पडा है.   

बद्रीनाथ धाम के कपाट वर्ष में छ: माह बन्द रहते है. सामान्यत: मई माह में ये कपाट दर्शनों के लिये खुल जाते है. कपाट खुलने पर मंदिर की अखंड ज्योति के दर्शनों को विशेष कल्याणकारी कहा गया है.  

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